ये माई कोरोना से मेला नाही लागी

 

पिन्टू सिंह

(बलिया) पूर्वांचल मे वाराणसी रामनगर रामलीला के बाद वर्ल्ड हेरिटेज की सूची में दर्ज दूसरे स्थान पर अपनी पहचान बना चुकी रसड़ा की ऐतिहासिक रामलीला जी हां खबर के माध्यम से आप सभी जनपद वासियों को बताते चलें कि एक तरफ जहां मूसलाधार बारिश व वैश्विक महामारी कोवीड 19 कोरोना की भेंट चढ़ चुकी है। सोमवार की बैठक में रामलीला कमेटी ने इस वर्ष रामलीला स्थगित करने का निर्णय लिया है।
इस एतिहासिक रामलीला में लाखों की भीड़ को देखते हुए कोरोना महामारी का खतरा बढ़ने के मद्देनजर इस वर्ष मेला आयोजन नहीं का निर्णय लिया गया है इसके बावजूद कुछ औपचारिकताएं जरूर ही पूरी की जायेंगी।
हालांकि मेला कमेटी इस प्रयास में है कि शासन का गाइड लाइन का पालन करते हुए छोटा रावण का पुतला विजय दशमी के दिन वैदिक मंत्रोच्चारण कर विधिः विधान से पूजन अर्चन कर रावण को महज़ पांच लोगों द्रारा जलाया जाय हालांकि अभी मंथन चल रहा है कन्फर्म नहीं है ।
इस वर्ष भी रामलीला नहीं लगने से जहां एक तरफ़ बच्चों में मायूसी है तो वहीं लाखों दर्शक रामलीला का आनंद दुसरे साल भी नहीं ले पायेंगे ।
इतिहास के पन्नों में दर्ज सैकड़ों वर्षों बाद पहली बार ऐसा होगा कि ऐतिहासिक रामलीला मैदान की विहंगम सीढ़ियां, रामलीला मैदान में अध्योध्या, अशोक वाटिका, लंका में सन्नाटा छाया रहेगा।
वैश्विक महामारी कोवीड 19 कोराना के चलते स्थगित हो चुकी रसड़ा की रामलीला का इतिहास के पन्नों में दर्ज बुजुर्गों के अनुसार वर्ष 1830 में नगर के बरनवाल जाति के पुरखा पुरंदर लाल ने सर्व प्रथम रामलीला का आयोजन किया था। बाद में चलकर इस रामलीला का नेतृत्व कलवार बिरादरी के हाथों में आ गया। 1921 में नगर के निवासी सीताराम ने रामलीला की पूरी कमान अपने हाथों में ले लिया और लगभग 30 वर्षों तक लगातार अपने जिम्मेदारी को बखूबी निभाते हुए रामलीला का आयोजन करते रहे। तत्पश्चात रामलीला कमेटियों के माध्यम से रामलीला का आयोजन प्रतिवर्ष होता आ रहा था। सीताराम के सहयोग से भैरो बाबा ने बड़े गोपनीय तरीका से रामलीला मैदान में एक सुरंग का निर्माण कराया। इस सुरंग का उपयोग आज भी डिजिटल युग में सती सुलोचना प्रसंग में किया जाता है ।