राजेश सिंह
आजमगढ़ अतरौलिया नगर पंचायत सहित ग्रामीण क्षेत्रों में परंपरागत तरीके से महिलाओं ने जिउतिया व्रत रखा, इस दौरान ब्रती महिलाओं में काफी उत्साह देखने को मिला । बता दे कि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवित्पुत्रिका व्रत रखा जाता है। इस व्रत को जिउतिया, जितिया, जीवित्पुत्रिका या जीमूतवाहन व्रत भी कहा जाता है। माताएं जीवित्पुत्रिका व्रत संतान प्राप्ति और उनके लंबी आयु की कामना के लिए रखती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, आश्विन मास की अष्टमी तिथि को हर साल जितिया व्रत का प्रथम दिन यानी नहाए खाए होता है। उसके अगले दिन निर्जला व्रत रखा जाता है। आज बुधवार के दिन ब्रती महिलाएं निर्जला रहती है, तथा अगले दिन सुबह पारण करती है। मान्यता यह भी है कि गन्धर्वराज जीमूतवाहन बड़े धर्मात्मा और त्यागी पुरुष थे। युवाकाल में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने चले गए थे। एक दिन भ्रमण करते हुए उन्हें नागमाता मिली, जब जीमूतवाहन ने उनके विलाप करने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नागवंश गरुड़ से काफी परेशान है, वंश की रक्षा करने के लिए वंश ने गरुड़ से समझौता किया है, कि वे प्रतिदिन उसे एक नाग खाने के लिए देंगे, और इसके बदले वो हमारा सामूहिक शिकार नहीं करेगा। इस प्रक्रिया में आज उसके पुत्र को गरुड़ के सामने जाना है। नागमाता की पूरी बात सुनकर जीमूतवाहन ने उन्हें वचन दिया, कि वे उनके पुत्र को कुछ नहीं होने देंगे, और उसकी जगह कपड़े में लिपटकर खुद गरुड़ के सामने उस शिला पर लेट जाएंगे, जहां से गरुड़ अपना आहार उठाता है, और उन्होंने ऐसा ही किया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को अपने पंजों में दबाकर पहाड़ की तरफ उड़ चला। जब गरुड़ ने देखा कि हमेशा की तरह नाग चिल्लाने और रोने की जगह शांत है, तो उसने कपड़ा हटाकर जीमूतवाहन को पाया। जीमूतवाहन ने सारी कहानी गरुड़ को बता दी, जिसके बाद उसने जीमूतवाहन को छोड़ दिया, और नागों को ना खाने का भी वचन दिया। जिउतिया त्यौहार को लेकर सुबह से ही बाजारों में काफी भीड़ रही, तो वही लोगों ने जिउतिया व्रत में उपयोग होने वाले फल तथा चीनी की मिठाइयों को खरीदा । नए वस्त्रों में व्रती महिलाएं जगह जगह समूह में इकट्ठा होकर कथा सुनाई तथा पुत्र के दीर्घायु होने की कामना की। त्योहार को लेकर नगर पंचायत समेत ग्रामीण इलाकों में भी काफी धूम् रही। जिउतिया व्रत में कथा सुनकर देर शाम तक महिलाएं अपने घर पहुँची।