पिन्टू सिंह

(बलिया ) पितृपक्ष की शुरुआत आश्विन मास के कृष्ण भाद्रपद प्रतीप्रदा एकम तिथि से प्रारंभ हो जाता है।और कृष्ण अमावस्या तिथि समाप्त होगी।
संपूर्ण कृष्णपक्ष में पितरों को संतुष्ट करने के लिए समर्पित किया गया है।इसी कारण इसे ‘पितृपक्ष’ कहा जाता है। पितरों का श्राद्ध करना हिंदू धर्म के लिए बहुत जरूरी माना जाता है।
यदि किसी मनुष्य का विधिपूर्वक कर्मकांड श्राद्ध और तर्पण ना किया जाए तो उसे इस लोक से मुक्ति नहीं मिलती और वह प्रेत के रूप में इस संसार में ही रह जाता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार कल दिन सुबह से शाम तक पितृ धरती पर रहते हैं।
शाम होने पर पितृ अपने लोक लौट जाते हैं। इस दिन का जो लोग लाभ नहीं उठाते हैं उन्हें साल भर पितरों की नाराजगी के कारण मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
इस दिन उन सभी मृतकों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो या जिनकी मृत्यु की तिथि की जानकारी नही हो। इसदिन सभी पितर अपने परिजनों के घर के द्वार पर कौआ या किसी अन्य रुप में बैठे रहते हैं। जो व्यक्ति इन्हें अन्न जल प्रदान करता है उससे प्रसन्न होकर पितर खुशी-खुशी ग्रहण कर आशीर्वाद देकर अपने लोक लौट जाते हैं।
पितृ पक्ष पन्द्रह दिन की समयावधि होती है जिसमें हिन्दु जन अपने पूर्वजों को भोजन अर्पण कर उन्हें श्रधांजलि देते हैं।
ब्रह्मपुराण के अनुसार जो भी वस्तु उचित काल या स्थान पर पितरों के नाम उचित विधि द्वारा ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक दिया जाए वह श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध के माध्यम से पितरों को तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है।पिण्ड रूप में पितरों को दिया गया भोजन श्राद्ध का अहम हिस्सा होता है।
हिन्दू मान्यताओं के अनुसार अगर पितर रुष्ट हो जाए तो मनुष्य को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
पितरों की अशांति के कारण धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है।
संतान-हीनता के मामलों में ज्योतिषी पितृ दोष को अवश्य देखते हैं।ऐसे लोगों को पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।
इन दिनों श्राद्ध में कौओं का बहुत बड़ा महत्व बढ़ जाता है।
ऐसी मान्यता है कि कौए को पितरों का रूप माना जाता है। मान्यता है कि श्राद्ध ग्रहण करने के लिए हमारे पितर कौए का रूप धारण कर नियत तिथि पर आते हैं ।