जयराम अनुरागी

बलिया जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है,रसड़ा विधानसभा का पारा गरमाता नजर आ रहा है। देखा जाये तो इस सीट पर बसपा के उमाशंकर सिंह दो बार से लगातार चुनाव जीतते आ रहे है।इस बार जहाँ ये हैटृिक लगाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोके हुए है,वही पर दुसरी तरफ यहां का विपक्ष भी अपने समस्त आपसी मतभेदों को भुलाकर इन्हें रोकने के लिएअभी से कसरत करना शुरु कर दिया है।अब देखना यह है कि इस बार के इस खेल में बाजी किसके हाथ लगती है।रसड़ा विधानसभा में बसपा के उमाशंकर सिंह का टिकट एक तरह से फाइनल है। प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी से इस बार कौन आयेगा,इसकी तस्वीर अभी तक साफ नहीं हो पायी है। यहां से सपा खुद अपना प्रत्याशी देगी या ये सीट गठबंधन के किसी सहयोगी दल को देंगी , कुछ कहा नहीं जा सकता है।अभी केवल कयासों का खेल जारी है। लेकिन इतना तो तय है कि इस सीट पर समाजवादी पार्टी इस बार अपनी पार्टी के मूल वोटर से इतर यानि यादव एंव मुस्लिम से अलग किसी जनाधार वाली कम्युनिटी से प्रत्याशी देकर बसपा को रोकने के लिए प्रयासरत है।

समाजवादी पार्टी का मानना है कि ओवीसी से किसी जनाधार वाली कम्युनिटी से कोई प्रत्याशी बनता है तो उसके समुदाय के साथ – साथ सपा के मूल मतदाता कहे जाने वाले यादव व मुस्लिम मतदाता आसानी से जुड़ सकते है। इसी कड़ी में कभी-कभी छोटे लाल राजभर का भी नाम चर्चा में आता रहता है।कभी-कभी तो ये भी चर्चा में आ रहा है कि समाजवादी पार्टी बसपा के उमाशंकर सिंह को रोकने के लिए पूर्व मंत्री स्व० घूरा राम के परिवार से किसी को उतार सकती है। इसके पीछे इन लोगों का तर्क है कि वर्तमान राजनैतिक परिस्थिति में बसपा के मूल वोटरों का एक तरह से उमाशंकर सिंह से नाराजगी बतायी जा रही है। इसी नाराजगी को भुनाने के लिए सपा इस बार घूरा राम के परिवार का सहारा लेकर उमाशंकर सिंह को मात देना चाहती है। कारण कि इस समय दलितों की सहानुभूति घूरा राम के परिवार के प्रति ज्यादें दिखाई दे रही है,जो क्षेत्र पंचायत चिलकहर के प्रमुखी चुनाव में देखने को भी मिला है।
जहाँ तक दलितों की नाराजगी का सवाल है,उसमें काफी दम भी दिख रहा हैं।उनका तर्क़ है कि क्षेत्रीय विधायक वोट तो दलितों का लेते है , लेकिन मजबूत केवल अपने लोगों को करते है।वे दलितों को केवल बंधुआ मतदाता बनाकर रखना चाहते है।यही कारण है कि दलितों का एक बहुत बड़ा वर्ग दलित बस्तियों में जाकर एक नये नारे का अभी से प्रचार करना शुरु कर दिया है कि “खा पीय सटी के ,बटन दबाव हटी के । “
यदि दलितों की यह रणनीति सफल रही तो उमाशंकर सिंह के लिए बड़ा संकट हो सकता है। इस वर्ग का ये भी तर्क है कि जब दलित कांग्रेस से हटा तो बाद में मुस्लिम भी हटा और जब मुस्लिम हटा तो ब्राह्मण भी हटा।इसी समीकरण पर प्रदेश और देश में लम्बे समय तक कांग्रेस की सरकार बनती रही है।आज कांग्रेस की हालत क्या है,पूरा देश आज देख रहा है। कमोवेश इस बार कुछ इसी तरह का समीकरण रसड़ा विधानसभा में बनता दिख रहा है। यहां से दलितों के हटने की स्थिति में मुस्लिम भी हटता नजर आ रहा हैऔर मुस्लिम के हटने की स्थिति में उमाशंकर सिंह का स्वजातिय मतदाता भी खिसक कर भाजपा की तरफ जा सकता है।
ऐसी स्थिति में उमाशंकर सिंह को अपनी सीट भी बचानी मुश्किल हो सकती है। क्योकि ये पहली बार 52825 मतो से चुनाव जीते थे। दुसरी बार इनका जीत का अन्तर 33887 हो गया। जिस रफ्तार से जीत का अन्तर घटता दिख रहा है,उससे तो यही दिख रहा हैं कि इस बार रसड़ा विधानसभा में खेला हो सकता है। इसके पीछे लोगों का तर्क यह है कि जिला पंचायत के चुनाव में उमाशंकर सिंह की भाजपा से नजदीकी के चलते इस विधानसभा के दलित व मुस्लिम मतदाता काफी नाराज है और इस बार मुक्ति पाना चाहते है‌। लेकिन ये इतना आसान भी नहीं दिख रहा है , क्योकि उमाशंकर सिंह भी एक मजे हुए खिलाड़ी है।ये हैटृिक लगाने के लिए कुछ भी कर सकते है।अब देखना यह है कि 2022 के इस खेल में विजय पताका किसके हाथ लगती है।