👉पिन्टू सिंह
(बलिया) इन पंक्तियों में कई राज छुपा है हुजूर शिक्षा विभाग के अधिकारियों की बात करें तो उनकी कार्य शैली पर यह शायरी सटीक बैठती है प्रशिक्षण केंद्र का मतलब ही है जहां जाने के बाद लोगों को तराश कर निकाला जाए उसके बाद ये लोग जिस क्षेत्र में जाए अपना और अपने विभाग का परचम लहरा दे लेकिन पूर्वांचल का एकमात्र प्रशिक्षण संस्थान ऐसा है जिसे खुद ही मरम्मत की दरकार है बलिया जिला मुख्यालय से लगभग 42 किलोमीटर दूर पकवाईनार के शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान को देखकर आप भी शर्मा जाए सबसे शर्मनाक बात यह कि यहां प्रशिक्षण करने के बाद शिक्षक बनने का सपना देखने वाले शिक्षकों के साथ अधिकारी गंदा मजा कर रहे हैं प्लास्टिक की कुर्सी पर बिठाकर प्रशिक्षण दिलाया जा रहा है ।
बिजली ,पंखा, कुर्सी ,मेज की व्यवस्था कमरों की रगाई पोताई हास्यास्पद बात है।
यही वजह है कि कागजों पर तो एकदिवसीय प्रशिक्षण में 60 जा रहे है लेकिन हकीकत में कुछ और ट्रेनिंग दी जा रही है ।
भगवान भरोसे शिक्षकों को टीचर बनने की ट्रेनिंग दी जाती है
वास्तव में इस संस्थान पर प्रशिक्षण भोजन नाश्ता मानदेय वेतन पर जितनी भारी भरकम रकम सरकार द्रारा भेजी जाती है यदि उस धन का सही प्रयोग होता तो कम से कम यहां से प्रशिक्षण पाने वाले शिक्षकों को कुर्सी पर बैठ ट्रेनिंग नहीं करना पड़ता
नतीजा यह है कि अधिकांश शिक्षको से सुविधा शुल्क लेकर नैया पार करा दी जाती हैं।
जब शिक्षकों को सही तरीके से ट्रेनिंग नहीं देंगे उनसे ना आने के लिए पैसा लेंगे तो उनसे इमानदारी की उमीद कैसे कर सकते हैं वैसे भी भ्रष्ट शिक्षक इमानदारी का पाठ कैसे पढा़येगा
सजपा के जिलाध्यक्ष व समाजसेवी बलवंत सिंह ने कहा कि शिक्षा विभाग हो या प्रशिक्षण संस्थान सभी जगह बिना रिश्वतखोरी के एक पता भी नहीं हिलता है।
पूरे मामले को गंभीरतापूर्वक लेते हुए संवाददाता ने शिक्षकों का पक्ष जानकारी करना चाहा गुरुवार को धरातल से नाम न छापने की शर्त पर प्रशिक्षण करने वालें शिक्षकों ने बतलाया कि देश के प्रधानमंत्री व यशश्वी मुख्यमंत्री प्लास्टिक मुक्त भारत चाहते हैं।
लगातार अभियान भी जनपद में चलाया जा रहा है। मगर हम शिक्षक व शिक्षिकाओं को केवल चार पुरी व प्लास्टिक में. सब्जी मिलता है।
इसी के सहारे प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।
नास्त भोजन चाय पानी कुछ नहीं दोपहर में एक बाहर दुकान से पूरी सब्जी आता है।
टायलेट मे बहुत गंदगी है।
मगर हम किससे शिकायत करें
हालांकि जानकारी के अनुसार बताते चलें कि बकायदा इसका जीएसटी देने वाले दुकानदारों से टेंडर प्रक्रिया होती है।
मगर सबकुछ कागजों में होता है मगर धरातल पर प्लास्टिक में पुडी सब्जी खिलाकर होती हैं ट्रेनिग ।
👉समाजसेवी संजीव सिंह ने कहा जहां से देश की तकदीर संवारने वाले शिक्षक पैदा किये जाते हैं वहा उनके प्रशिक्षण के प्रति घोर लापरवाही बरता जाना नींदनीय है।