बेतिया। बिहार राज्य किसान सभा के संयुक्त सचिव प्रभुराज नारायण राव ने कहा है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 13 महीने से चल रहे किसान आंदोलन की समाप्ति के लिए मजबूर होकर किसान विरोधी तीनों काले कानूनों की वापसी की घोषणा आनन-फानन में 19 नवंबर को 8 बजे रात्रि में की थी। उन्होंने यह भी कहा था कि किसान अपने घर जाएं मैं एमएसपी तथा अन्य मांगों के लिए कमेटी का गठन जल्दी करूंगा। जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे और उसमें इन सारी समस्याओं को हल कर लिया जाएगा। जब कृषि मंत्री द्वारा 24 मार्च को संयुक्त किसान मोर्चा से मात्र 3 प्रतिनिधियों की सूची मांगी गई और कहा गया की अगली बैठक में इन सवालों पर बैठकर इसे हल कर लिया जाएगा। तो संयुक्त किसान मोर्चा ने पूछा था की इस कमेटी के टर्म्स आफ रेफरेंस क्या होंगे। संयुक्त किसान मोर्चा के अलावा किन-किन और संगठनों, व्यक्तियों और पदाधिकारियों को इसमें शामिल किया जाएगा। इस कमेटी के अध्यक्ष कौन होंगे और उनकी कार्यप्रणाली क्या होगी। इस कमेटी को अपनी रिपोर्ट देने के लिए कितना समय लगेगा। क्या यह कमेटी अपनी सिफारिश जब सरकार को देगी तो सरकार इस कमेटी के फैसले को केंद्र सरकार मानने को बाध्यकारी होगी।
केंद्रीय सरकार इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन टेलीविजन और अन्य प्रचार तंत्र के माध्यम से लगातार यह विज्ञप्ति दिया जाता रहा कि संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधियों के नाम आते ही इस कमेटी का गठन कर लिया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के समय ही यह बात संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं को महसूस हो गया था कि केंद्र सरकार के द्वारा निश्चित रूप से किसानों को गुमराह करने की करवाई हो सकती है ठीक वैसा ही हुआ।
इस कमेटी के अध्यक्ष संजय अग्रवाल जो पूर्व कृषि सचिव थे और तीनों किसान विरोधी काले कानूनों को बनाने वाले हैं। उनके साथ नीति आयोग के सदस्य रमेश चंद जो लगातार तीनों किसान विरोधी कृषि कानूनों का प्रचार करते रहे हैं। इतना ही नहीं ये सरकारी विशेषज्ञ तथाअर्थशास्त्री भी वह हैं। जो हमेशा एमएसपी को कानूनी दर्जा देने के विरोधी रहे हैं। इस कमेटी में संयुक्त किसान मोर्चा से मात्र 3 प्रतिनिधियों का नाम मांगा गया। 5 स्थानों पर सरकार के वफादार लोगों को शामिल कर लिया गया। ये लोग हैं जो खुलकर किसान विरोधी तीनों काले कानूनों के प्रचार तंत्र का काम करते रहे हैं। कहीं ना कहीं ये लोग सीधे भाजपा और आरएस एस से जुड़े हुए हैं।
कृष्णा बीर चौधरी भारतीय कृषक समाज से जुड़े हैं और वह भाजपा नेता भी हैं। सैयद पाशा पटेल महाराष्ट्र से भाजपा के पूर्व एमएलसी हैं। प्रमोद कुमार चौधरी आर एस एस तथा उसका किसान संगठन भारतीय किसान संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। गुणी प्रकाश किसान आंदोलन के मुख्य विरोधी रहे हैं। गुणवंत पाटिल शेतकरी संगठन से जुड़े हैं तथा भारतीय स्वतंत्र पार्टी से जुड़े हुए हैं। इस तरीके से यह पांच लोग खुल्लम खुल्ला कृषि विरोधी तीनों काले कानूनों के पक्षधर रहे हैं और सरकार के करीबी हैं। कमेटी के द्वारा जारी एजेंडा में एमएसपी पर कानून बनाने के संबंध में कोई चर्चा नहीं है। कुछ ऐसे आइटम इस एजेंडा में डाले गए हैं। जिन पर सरकार द्वारा पहले ही कमेटी बनाई जा चुकी है। जो तीनों कृषि कानूनो को वापस लेने की कोशिश कर सकती है।
ऐसी गंभीर परिस्थिति में संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा इस कमेटी में भाग नहीं लेने का निर्णय यानी संयुक्त किसान मोर्चा द्वारा कोई भी प्रतिनिधि नहीं भेजने का यह कठोर कदम लेना पड़ा है और संयुक्त किसान मोर्चा ने स्पष्ट रूप से यह घोषणा भी कर दिया है कि एमएसपी को कानूनी दर्जा दिलाने, किसानों के फसल को लागत का डेढ़ गुना दाम दिलाने, सारे मुकदमें समाप्त करने, किसान आंदोलन में शहीद हुए 750 सौ लोगों को मुआवजा दिलाने तथा लखीमपुर खीरी में 4 किसानों को जिप् से रौंद कर हत्या करने वाले केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री अजय कुमार टेनी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर उन पर हत्या का मुकदमा चलाने आदि मांग के लिए लड़ाई जारी रहेगी।
श्री राव ने यह भी कहा कि संयुक्त किसान मोर्चा केंद्रीय सरकार के कृषि मंत्री या देश के प्रधानमंत्री के झूठे जुमलेबाजी पर भरोसा नहीं करते बल्कि उन्हें इस बात का विश्वास है कि दुनिया के बड़े-बड़े तनाशाहो को जनता की एकजुट ताकत ने गद्दी से उतारा है। नामोनिशान मिटाया है। तो इस देश में चल रहे झूठों की सरकार को भी यहां की जनता एकजुट किसान संघर्ष को सहयोग करके देश के मजदूर खेत मजदूर, छात्र, नौजवान, दलित, आदिवासी तथा आधी आबादी रखने वाली महिलाओं की बड़ी ताकत इस देश की निर्णायक सकती है और वह अपनी एक एकजुट ताकत के बल पर इस जनविरोधी मोदी सरकार को गद्दी से उतारने में कामयाब होगी।
संवाददाता- राजेन्द्र कुमार बेतिया