रिपोर्ट, राजेश सिंह 

 (अतरौलिया) आजमगढ़। पितृ पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होता है और आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। इसमें लोग पूरे पंद्रह दिनों तक अपने पूर्वजों को याद करते हैं। इन 15 दिन की अवधि में लोग अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म भी करते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान किसी नई वस्तु की खरीदारी व गृह प्रवेश समेत अन्य मांगलिक कार्य धार्मिक अनुष्ठान करना शुभ नहीं रहता पूरे विधि विधान से पितरों का श्राद्ध करना चाहिए। पितृ पक्ष का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, पितृ पक्ष में पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पूजन किया जाता है। पितृ पक्ष में पितरों के प्रति आदर-भाव प्रकट किया जाता है। पितृ पक्ष या श्राद्ध करीब 16 दिनों के होते हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से शुरू होते हैं और आश्विन मास की अमावस्या को समापन होता है।
शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि 16 दिनों तक चलने वाले पितृ पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि क्रियाएं की जाती है। पितृ पक्ष में पितरों के श्राद्ध वाले दिन कौआ को भोजन कराने की परंपरा है। मान्यता है कि कौवे के माध्यम से भोजन पितरों तक पहुंच जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर कौवे के रूप में पृथ्वी पर आते हैं। हिंदू धर्म में पितृपक्ष का एक विशेष महत्व है जो शनिवार से शुरू हो गया है।