बेतिया। भारत के आदिवासी समाज के उत्थान एवं देश की स्वाधीनता के लिए समर्पित रहा महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का जीवन दर्शन। भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद बिरसा मुंडा की 147 वीं जन्मदिवस पर सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा भव्य कार्यक्रम का आयोजन। भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद बिरसा मुंडा एवं स्वतंत्रता सेनानियों को दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि। 15 नवंबर 2022 को भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद बिरसा मुंडा की 147 वी जन्मदिवस पर सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन के सभागार सत्याग्रह भवन में एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ,बुद्धिजीवियों एवं छात्र छात्राओं ने भाग लिया। इस अवसर पर सचिव सत्याग्रह रिसर्च फाउंडेशन डॉ एजाज अहमद अधिवक्ता, डॉ सुरेश कुमार अग्रवाल चांसलर प्रज्ञान अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय झारखंड, डॉ शाहनवाज अली, डॉ अमित कुमार लोहिया, वरिष्ठ अधिवक्ता शंभू शरण शुक्ल, सामाजिक कार्यकर्ता नवीदूं चतुर्वेदी, पश्चिम चंपारण कला मंच की संयोजक शाहीन परवीन, डॉ महबूब उर रहमान एवं अल बयान के सम्पादक डॉ सलाम ने संयुक्त रूप से कहा कि आज ही के दिन आदिवासियों के मसीहा एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को हुआ था। सारा जीवन आदिवासियों के उत्थान एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए समर्पित रहा। भारत के इतिहास में बिरसा मुंडा एक ऐसे आदिवासी नायक हैं जिन्होंने अपने क्रांतिकारी विचारों से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आदिवासी समाज की दिशा बदलकर आधुनिक सामाजिक और राजनीतिक युग का सूत्रपात किया। अंग्रेजों द्वारा थोपे गए ब्रिटिश कानूनों को चुनौती देकर बर्बर ब्रिटिश साम्राज्य को स्वाधीनता मानवता एवं नागरिक अधिकारों के लिए सोचने पर विवश कर दिया। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि बिरसा मुंडा ने आदिवासी समाज मे अंधविश्वासों को समाप्त करते हुए नई जागृति लाने का प्रयास किया था। बिरसा मुंडा ने सभी धर्मों की अच्छाइयों से कुछ न कुछ निकाला और अपने अनुयायियों को उसका पालन करने के लिए प्रेरित किया। 1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर बिरसा ने अंग्रेजों से लगान माफी के लिए आन्दोलन चलाया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी, लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी। उन्हें उस इलाके के लोगों द्वारा “धरती बाबा” के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं एवं अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूँटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियाँ हुईं। बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को शोषण एवं यातना से मुक्ति दिलाने के लिए उन्हें तीन स्तरों पर संगठित करना आवश्यक समझा। पहला तो सामाजिक स्तर पर ताकि आदिवासी-समाज अंधविश्वासों एवं पाखंड के पिंजरे से बाहर आ सके। इसके लिए उन्होंने आदिवासियों को स्वच्छता का संस्कार सिखाया। शिक्षा का महत्व समझाया। सहयोग और सरकार का रास्ता दिखाया। बिरसा मुंडा ने उनके नेतृत्व की कमान संभाली। आदिवासियों ने ‘बेगारी प्रथा’ के विरुद्ध जबर्दस्त आंदोलन किया। परिणामस्वरूप जमींदारों और जागीरदारों के घरों तथा खेतों और वन की भूमि पर कार्य रुक गया।आदिवासी अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति सजग हुए। जनवरी 1900 में डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। ब्रिटिश हुकूमत ने इसे खतरे का संकेत समझकर बिरसा मुंडा को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। वहां अंग्रेजों ने उन्हें धीमा जहर दिया था जिस कारण 9 जून 1900 को बिरसा की मृत्यु हो गई। इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि जिस समय महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेदी सरकार के खिलाफ लोगों को एकजुट कर रहे थे, लगभग उसी समय भारत में बिरसा मुंडा अंग्रेजों-शासकों के खिलाफ एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ चुके थे। गांधी से लगभग छह साल छोटे बिरसा मुंडा का जीवन सिर्फ 25 साल का रहा। उनका संघर्ष काल भी सिर्फ पांच साल का रहा, लेकिन इसी अवधि में उन्होंने अंग्रेजों-शासकों के खिलाफ जो संघर्ष किया, जिस ने बिरसावाद को जन्म दिया, उसने बिरसा को अमर कर दिया। आज आदिवासियों की जो स्थिति है, आदिवासी समाज की समस्याएं हैं, उसे बिरसा ने सौ-सवा सौ साल पहले भांप लिया था। यह बताता है कि बिरसा कितने दूरदर्शी थे।