– 5 घंटे के हाई प्रोफाइल ड्रामा के बाद भी पुलिस आदेश का पालन किए वगैर लौटी बैरंग
बेतिया। पश्चिम चम्पारण के बेतिया में स्वास्थ्य विभाग का सिविल सर्जन कार्यालय अपने त्वरित आधारहीन कार्यवाही को लेकर जिला में शर्मसार हो रहा है। जहाँ जन चर्चा है कि आखिर सैकड़ों झोलाछाप क्लिनिकों पर कभी जांच नहीं करने वाली स्वास्थ्य विभाग की टीम 16 दिन पूर्व ही खुले डिग्रीधारी डॉक्टर के मां शारदा हेल्थ क्लिनिक को सील और प्राथमिकी करने का आदेश किस निजी महत्त्वाकांक्षा को पूर्ण करने में दिया गया? आइए जानते हैं कि आखिर अपने ही दिए आदेश में कैसे उलझ गए बेतिया के सिविल सर्जन और स्वयं के आदेश का पालन ना कर 5 घंटे के नाटक के पश्चात खाली हाथ बैरंग लौट गए।
जब मामले की पड़ताल हुई तो मालूम हुआ कि 6 नवम्बर 2022 को जीवन राम राजगढ़िया ट्रस्ट द्वारा संचालित मां शारदा हेल्थ क्लिनिक का उद्घाटन किया गया। जिसके डॉक्टर राकेश रौशन, एमडी मेडिसिन, डॉ नीतु कुमारी, एमएस, स्त्री रोग विशेषज्ञ और डॉ राजेश कुमार हैं। चूंकि तीनों कुशल और अनुभवी डिग्रीधारी डॉक्टर होने के कारण अपने प्रचार प्रसार में अपनी विशेषता को बताते हुए संभावित इलाजों की सूची जारी करना उनके ऊपर बड़ी कार्यवाही बन जाएगी यह उन्होंने इसलिए नहीं सोचा क्योंकि जिला में जब एक झोलाछाप गंभीर ऑपरेशन धड़ल्ले से करता है और जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग मौन धारण कर चुप्पी बना रखता है तो फिर मैं डिग्रीधारी होकर क्यों नहीं आने वाले समय में कर सकता। जिसके लिए उन्होंने आवश्यक कागजातों को सिविल सर्जन कार्यालय में जमा भी किया और वहाँ से लाइसेंस निर्गत कर अमेरीकी मेडिकल कंपनी से 40 लाख का ऋण लेकर उपकरण भी मंगवाया। उस समय तक सिविल सर्जन कार्यालय ने ना तो रोक लगाया और ना ही कोई नोटिस जारी की पर उपकरण मंगाने का लाइसेंस जरूर दे दिया।

इधर सिविल सर्जन कार्यालय से सोमवार 21 नवम्बर 2022 को अचानक से मां शारदा हेल्थ क्लिनिक को सील और प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश निर्गत किया गया और आदेश निर्गत होते ही दंडाधिकारी और पुलिस के साथ स्वास्थ्य विभाग की पांच सदस्यीय टीम भी पहुंच गए। हालांकि अपुष्ट सूत्रों के अनुसार उनके आने की सूचना भी क्लिनिक संचालक को हो गई थी इसलिए शायद पोस्टर बैनर, उपकरण और मरीजों तक को हटा दिया गया था। और शेष जो रह गया था वो एक क्लिनिक की व्यवस्था को दिखाता नजर आया। कार्यवाही का आदेश सिविल सर्जन ने अनुमंडल पदाधिकारी बेतिया सदर के पत्रांक 986गो./05/11/22, पत्रांक 647/ 15/11/22 और एसीएमओ के पत्रांक 465/11/11/22 के प्रसंग को दिखाते हुए पांच सदस्यीय टीम को जारी किया। जिसमें यह उल्लेखित है कि जीवन राम राजगढ़िया ट्रस्ट द्वारा संचालित मां शारदा हेल्थ क्लिनिक ने प्रथम दृष्टया बिहार क्लिनिकल इसटेबलाइसमेंट एक्ट 2013 के तहत अस्पताल का पंजीकरण, बायो मेडिकल वेस्ट के प्रबंधन हेतु संस्थान का अनुबंध प्रमाण पत्र, पर्यावरण विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र, अग्निशामक विभाग का अनापत्ति प्रमाणपत्र एवं अस्पताल के भवन निर्माण हेतु नगर निगम का स्वीकृति प्रमाणपत्र वर्तमान समय तक प्रस्तुत नहीं किया गया और अस्पताल का शुभारंभ 06 नवम्बर को कर दिया गया। साथ ही उक्त तिथि को लेकर अस्पताल संचालक के द्वारा संचालन हेतु कोई अनुमति आदेश प्राप्त नहीं किया गया था। इन पांच शर्तों को पूरा नहीं करने को लेकर सिविल सर्जन पश्चिम चम्पारण डॉ बिरेन्द्र चौधरी ने 24 घंटा के अंदर अस्पताल को सील करते हुए प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे दिया। वहीं पूरे मामले की विडियोग्राफी करते हुए उपकरणों की सूची भी तैयार करने का निर्देश दिया।
उक्त निर्देश के पालन को लेकर स्वास्थ्य विभाग की टीम, दंडाधिकारी और नगर थाना पुलिस जब क्लिनिक के पास पहुंची तो वो खुद ही भ्रमित हो गए। जिसके कारण अस्पताल संचालक और टीम के बीच कहा सूनी भी हुई। जहाँ टीम के समझ से परे होने पर सिविल सर्जन भी पहुंच गए पर वो भी घंटों माथा पच्ची करने के बाद अपने आदेशों का पालन करा पाने में असमर्थ दिखें। संचालक के द्वारा बिना नोटिस के सील कराए जाने का कड़ा विरोध होने के बाद सिविल सर्जन के पसीने छूटने लगे। लगभग पांच घंटा तक क्लिनिक में पदाधिकारियों और पुलिस की मुस्तैदी बेअसर होने लगी। वहीं कागजातों के जांच के बहाने पदाधिकारी, अस्पताल संचालक और कुछ गणमान्यों के साथ बंद कमरे में क्या बात हुई कि सिविल सर्जन अचानक से बाहर निकल पड़े। वहीं मीडिया के द्वारा पूछे जाने पर चुप्पी धारण किए रहें पर जाते जाते यह जरूर बताया कि कागजातों की जांच कर अभिलेखों को लिया गया है। गहन अध्ययन के बाद आवश्यक कार्यवाही की जाएगी, और बिना सील और प्राथमिकी किए हुए सिविल सर्जन, छापेमारी टीम और पुलिस बल वापस लौट गई।
सिविल सर्जन ने जाते जाते कई ऐसे सवालों को जन्म दे दिया जिससे जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग दोनों की कार्यशैली पर सवाल उठना लाजमी हो गया। आखिर जब कागजों का गहनता से जांच नहीं किया गया तो फिर सील और प्राथमिकी का आदेश किस प्रभाव से निर्गत किया गया? जब पांच बिन्दुओं पर कार्यवाही करने का आदेश निर्गत हुआ जिसे क्लिनिक ने पूरा नहीं किया था तो फिर क्यों नहीं पूरे प्रशासनिक टीम ने अपनी कार्यवाही को पूर्ण किया? आखिर अपने दिए आदेश में क्यों दिग्भ्रमित हुए पश्चिम चम्पारण के सिविल सर्जन डॉ बिरेन्द्र चौधरी और छापेमारी टीम में शामिल एसीएमओ डॉ रमेश चंद्रा, अपर उपाधीक्षक डॉ टीएन प्रसाद, इपीडिमियोलॉजिस्ट डॉ आरस मुन्ना एवं अन्य।
वहीं जनता में चर्चा का विषय रहा कि अच्छे और नए डिग्रीधारी डॉक्टर की कमी है और कोई बाहर से आकर अपनी सेवा देना चाहता है तो उसे रोकने का प्रयास किया जा रहा है। जबकि जिला मुख्यालय और आसपास सभी क्षेत्रों में झोलाछाप बिना डिग्री के धड़ल्ले से मरीजों का इलाज और ऑपरेशन करते हैं और कईयों को जान से अपना हाथ धोना पड़ता है पर स्वास्थ्य विभाग मुखदर्शक और मौन व्रत धारण किए रहता है। वहीं कुछ स्थानीय सूत्रों ने बताया कि उक्त क्लिनिक वाले जमीन पर प्रशांत राजगढ़िया और गोविंद राजगढ़िया का जमीनी विवाद है। मां शारदा क्लिनिक के संचालक ने गोविंद राजगढ़िया से यह जमीन क्लिनिक के लिए लिया था, जिसको लेकर आपत्ति जताते हुए जिला प्रशासन से प्रशांत राजगढ़िया ने कार्यवाही करने का निवेदन किया था। वहीं मां शारदा हेल्थ क्लिनिक के डॉक्टर राकेश रौशन के समर्थन में आईएमए के सदस्य भी समर्थन में छापेमारी के दरम्यान अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
वहीं इस पूरे मामले को लेकर सिकटा भाकपा-माले विधायक बीरेन्द्र प्रसाद गुप्ता ने कहा है कि स्वास्थ्य विभाग की छापामारी से जमीन विवाद को हल करने का एक अजीबोगरीब तरीका है, वहीं माले ने कहा है कि बड़े भूपतियों एवं भू स्वामियों के इच्छा के अनुसार जिला प्रशासन चल रहा है।