आजमगढ़  । त्रिनिदाद और टोबैगो के पहले भारतीय मूल के प्रधान मंत्री बासदेव पांडे की, 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया, बता दे कि पूर्व प्रधानमंत्री वासुदेव पांडे मूल रूप से आजमगढ़ जनपद के लखमन के रहने वाले थे, उनकी मृत्यु की सूचना जैसे ही जनपद वासियों को हुई शोक की लहर फैल गई, उनके पुरखे गिरगिटिया मजदूर के तौर पर त्रिनिदाद और टोबैगो गए थे, और वहां के नागरिक हो गए थे, अगस्त 1962 में कैरेबियाई राष्ट्र को स्वतंत्रता मिलने के बाद 1995-2001 तक देश के पांचवें प्रधान मंत्री के रूप में रहे, उनकी बेटी मिकेला पांडे के अनुसार, बासुदेव पांडे की मृत्यु 1 जनवरी यानी नए साल पर उनके परिवार के बीच हुई, बेटी मिकेला ने अपने पिता के निधन की जानकारी देते हुए फेसबुक पर लिखा, “गहरे दुख के साथ, हम यह बताना चाहेंगे, कि हमारे प्यारे पिता, बासदेव पांडे का 1 जनवरी 2024 को उनके परिवार के बीच निधन हो गया.” “जीवन और मृत्यु में वह एक योद्धा थे, वह अपने जूते पहने हुए थे, अपनी बुद्धि और हास्य से अपने आस-पास के सभी लोगों को आश्चर्यचकित करते रहे, वह हम सभी के बीच जीवित रहेंगे, उन्हें एक अद्भुत पति, पिता, दादा, नेता और दोस्त के रूप में याद किया जाएगा.” बता दें कि 2005 के प्रवासी भारतीय सम्मान प्राप्तकर्ता बासदेव पांडे के परिवार में उनकी पत्नी ओमा पांडे, और उनकी चार बेटियां हैं, 25 मई, 1933 को प्रिंसेस टाउन के एक गांव में जन्मे, उन्होंने न्यू ग्रांट गवर्नमेंट प्राइमरी स्कूल और बाद में प्रेजेंटेशन कॉलेज, सैन फर्नांडो में पढ़ाई की, जहां उन्होंने कैम्ब्रिज स्कूल सर्टिफिकेट प्राप्त किया, इंग्लैंड जाकर उन्होंने 1960 में लंदन स्कूल ऑफ ड्रामेटिक आर्ट से ड्रामा में डिप्लोमा कोर्स किया, और 1962 में इन्स ऑफ कोर्ट ऑफ लॉ एच से कानून की डिग्री हासिल किया, उन्होंने पहली बार 15 सितंबर, 1972 को एक विपक्षी सीनेटर के रूप में संसद में प्रवेश किया, और बाद में कौवा उत्तर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए प्रतिनिधि सभा के सदस्य बने, उनकी मृत्यु के एक दिन बाद, मंगलवार रात चगुआनास में एक धार्मिक उत्सव आयोजित किया गया, और इसमें उनके परिवार और दोस्तों ने भाग लिया, त्रिनिदाद और टोबैगो की आबादी में लगभग 38 प्रतिशत भारतीय हैं, और 2023 तक देश में भारतीयों की अनुमानित आबादी 5.60 लाख है, सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 1845 और 1917 के बीच त्रिनिदाद में लगभग 143,000 गिरमिटिया श्रमिकों का योगदान दिया था ।