चुनाव आयोग ने शनिवार को शाम 3 बजे लोकसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया है, इसके साथ ही पूरे देशभर में आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है, आदर्श आचार संहिता चुनावों के दौरान सभी हितधारकों द्वारा स्वीकार्य नियम है, आचार संहिता का मुख्य उद्देश्य, प्रचार, मतदान व मतगणना को व्यवस्थित, स्वच्छ और शांतिपूर्ण रखना, और सत्तारूढ़ दलों द्वारा राज्य मशीनरी और वित्त के किसी भी दुरुपयोग को रोकना होता है, लेकिन इसे कोई वैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं है, हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर इसकी सुचिता को बरकरार रखा है, चुनाव आयोग आचार संहिता के किसी भी उल्लंघन की जांच करने और सजा सुनाने के लिए पूरी तरह से अधिकृत होता है । बता दें कि निर्वावन आयोग ने 1979 में राजनीतिक दलों के एक सम्मेलन में ‘सत्ताधारी दलों’ के आचरण की निगरानी करने वाला एक अनुभाग जोड़कर संहिता को समेकित किया, शक्तिशाली राजनीतिक अभिनेताओं को उनकी स्थिति का अनुचित लाभ प्राप्त करने से रोकने के लिए एक व्यापक ढांचे के साथ एक संशोधित संहिता जारी किया, एक संसदीय समिति ने 2013 में सिफारिश की थी कि आदर्श आचार संहिता को वैधानिक जामा पहनाया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निर्वाचन आयोग को अपनी शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए कोई रिक्तता नहीं हो, समिति ने सिफारिश की थी कि आदर्श आचार संहिता को चुनाव की अधिसूचना की तारीख से लागू किया जाए, न कि घोषणा की तारीख से; इसे और अधिक यथार्थवादी बनाने के लिए उम्मीदवारों की चुनाव व्यय सीमा में संशोधन; फास्ट-ट्रैक अदालतें 12 महीने के भीतर चुनावी विवादों का निपटारा करें और निदर्लीय सांसदों को चुनाव के छह महीने के भीतर, आदर्श आचार संहिता के मुताबिक मंत्री और अन्य सरकारी अधिकारी किसी भी रूप में वित्तीय अनुदान की घोषणा नहीं कर सकते हैं, किसी भी परियोजना या योजना की घोषणा नहीं की जा सकती है, जिसका प्रभाव सत्ता में पार्टी के पक्ष में मतदाताओं को प्रभावित करने वाला हो ।